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हरियाणा की रागिनी परंपरा: लोकसाहित्य का अनुपम दर्पण

लेखक: पंडित विद्याधर शर्मा (Chief Editor) • 19 Oct 2026 • ⏳ 4 मिनट पठन (min read)

हरियाणा की धरती केवल शौर्य और पराक्रम की ही नहीं, अपितु उच्च कोटि के लोकसाहित्य और संगीत की भी तपोभूमि रही है। यहाँ की 'रागिनी' परंपरा लोक-चेतना का वह सशक्त माध्यम है जिसने सदियों से जनमानस को दर्शन, नीति और इतिहास से जोड़े रखा है।

### सांग और रागिनी का सांस्कृतिक ताना-बाना
दादा लखमी चंद को हरियाणवी लोकसाहित्य का 'सूर्य कवि' कहा जाता है। उनकी रचनाओं में वेदांत, महाभारत और नीतिशास्त्र के गूढ़ रहस्य सहज लोकभाषा में व्यक्त हुए हैं।

"रागिनी मात्र मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला और संस्कारों की संवाहिका है।"

जब चौपालों में सारंगी और घड़े की थाप पर रागिनी गाई जाती है, तो श्रोता उसमें लीन हो जाते हैं। आज डिजिटल युग में 'हरियाणा कुंज' जैसे मंचों का दायित्व है कि इस समृद्ध विरासत को नई पीढ़ी तक आधुनिक गरिमा के साथ पहुँचाया जाए।

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